अव्ययीभाव समास (संस्कृत)

संस्कृत भाषा में च, अपि, इति, अधुना, अत्र, तत्र, उपरि, अधः, प्रति, यथा, तथा। ये ऐसे शब्द हैं जिन्हे अव्यय इस नाम से जाना जाता है। और अव्यय इस शब्द का अर्थ होता है कभी भी ना बदलने वाला। चाहे कोई भी लिंग हो, वचन हो, विभक्ति हो; ये शब्द बिल्कुल भी नहीं बदलते।

ठीक उसी प्रकार से संस्कृत भाषा में अव्ययीभाव समास की प्रक्रिया से बने शब्द भी बिल्कुल भी नहीं बदलते। अब प्रश्न यह है कि शब्द में बदलाव किस कारण से होते हैं? तो उत्तर हैं लिंग, वचन, विभक्ति तथा लकार ये ऐसे कारण जिन से शब्दों में बदलाव होते हैं। और अव्यय ऐसे शब्द होते हैं जो कोई भी लिंग, वचन, विभक्ति या लकार हो; वे नहीं बदलते।

और जब हम अव्ययीभाव समास की बात करते हैं, तो उसकी कुछ विशेषताएँ हम सदैव स्मरण में रखनी हैं।

अव्ययीभाव समास की विशेषताएं

  • अव्ययीभाव समास की प्रक्रिया से बना हुआ शब्द भी अव्यय कहलाता है।
  • अव्ययीभाव समास की प्रक्रिया से बना शब्द हमेशा नपुंसक लिङ्ग और एकवचन में ही होता है।

यदि प्रक्रिया के फलस्वरूप मिलने वाला अन्तिम शब्द नपुंसक ही बनने वाला है तो हमें विभिन्न शब्दों को नपुंसक लिङ्ग में परिवर्तित करने कि विधि की जानकारी भी आवश्यक है। निम्न प्रकार से शब्द नपुंसक हो सकते हैं –

शब्दों को नुपंसक कैसे बनाते हैं?

1.     अकारान्त शब्दों के अन्त में अम् प्रत्यय लगाते हैं।

2.     यदि शब्द अकारान्त नहीं है तो उसे वैसा ही रहने देते हैं। उसे कोई भी अन्य प्रत्यय नहीं लगेगा।

3.     यदि शब्द दीर्घान्त (दीर्घ स्वर से अन्त होने वाला) है तो उसे ह्रस्वान्त (ह्रस्व स्वर से अन्त होने वाला) बनाते हैं।

अब इन तीनों नियमों को ध्यान में रखते हुए हम कुछ शब्दों के उदाहरणों से नपुंसकविधि समझते हैं –


  • अकारान्त शब्द – शब्द के अन्त में अम् प्रत्यय लगाया जाता है।


  1. रामः – रामम्।
  2. देवः – देवम्।
  3. बालकः – बालकम्।
  4. विद्यालयः – विद्यालयम्।
  5. फलम् – फलम्।
  6. पुष्पम् – पुष्पम्।

एक बार इस विधि को ठीक से समझने के बाद अब हम अव्ययीभाव समास को सीखने के लिए तैयार हैं। तो आईए अब हम पाठ्यक्रम में निर्दिष्ट अव्ययों की मदद से अव्ययीभाव समास को समझते हैं।

१. अनु

– षष्ठी विभक्ति।

यदि समस्त पद के पूर्वपद में अनु यह अव्यय पद दिखे तो उत्तरपद को षष्ठी विभक्ति लगाकर उसके बाद पश्चात् अथवा योग्यम् इनमें उचित (सही) शब्द लिखा जाता है।

पश्चात् का अर्थ होता है – …… के बाद / पीछे

और योग्यम् का अर्थ होता है – ..… के लिए योग्य

१.१. पश्चात् इस अर्थ में –

  • सैनिकाः अनुरथं चलन्ति।
    • सैनिकाः रथस्य पश्चात् चलन्ति।
    • सैनिक रथ के पीछे चलते हैं।
  • आरक्षकः अनुचौरं धावति।
    • आरक्षकः चौरस्य पश्चात् धावति।
    • पुलिस चोर के पीछे दौडता है।
  • कृषकाः अनुवृष्टि बीजानि वपन्ति।
    • कृषकाः वृष्टेः पश्चात् बीजनि वपन्ति।
    • किसान बारिष के बाद बीज बोते हैं।
  • क्रिकेट्मध्ये क्षेत्री अनुकन्दुकं धावति।
    • क्रिकेट्मध्ये क्षेत्री कन्दुकस्य पश्चात् धावति।
    • क्रिकेट में फिल्डर गेंद के पीछे दौडता है।
  • बालकः अनुजननि गच्छति।
    • बालक जनन्याः पश्चात् गच्छति।
    • बालक माँ के पीछे जाता है।
  • अनुनेतृ राजनैतिकदलस्य कार्यकर्तारः चलन्ति।
    • नेतुः पश्चात् राजनैतिकदलस्य कार्यकर्तारः चलन्ति।
    • नेता के पीछे राजनैतिक पक्ष के कार्यकर्ता चलते हैं।

१.२. योग्यम् इस अर्थ में –

  • सीतायै रामः अनुरूपं वरः अस्ति।
    • सीतायै रामः रूपस्य योग्यं वरः अस्ति।
    • सीता के लिए राम योग्य रूप वाला दूल्हा है।
  • वृषभः कृषिकार्याय अनुगुणं पशुः अस्ति।
    • वृषभः कृषिकार्याय गुणस्य योग्यं पशुः अस्ति।
    • बैल खेती के लिए योग्य गुण वाला पशु है।

 २. उप

षष्ठी विभक्ति

यदि समस्तपद के पूर्वपद में उप यह अव्यय हो तो उसका विग्रह करते समय उत्तरपद को षष्ठी विभक्ति लगा कर उसके बाद में समीपम् यह पद लिखा जाता है।

  • अर्जुनः उपकृष्णम् उपविशति।
    • अर्जुनः कृष्णस्य समीपम् उपविशति।
    • अर्जुन कृष्ण के पास बैठता है।
  • वृक्षाः उपगृहं सन्ति।
    • वृक्षाः गृहस्य समीपं सन्ति।
    • पेड घर के पास हैं।
  • हनुमान् उपरामं गच्छति।
    • हनुमान् रामस्य समीपं गच्छति।
    • हनुमान राम के पास जाता है।
  • विद्या तु उपगुरु एव प्राप्यते।
    • विद्या तु गुरोः समीपम् एव प्राप्यते।
    • विद्या तो गुरु के पास ही प्राप्त होती है।
  • उपवृक्षं शिवलिङ्गम् अस्ति।
    • वृक्षस्य समीपं शिवलिङ्गम् अस्ति।
    • वृक्ष के पास शिवलिङ्ग है।
  • उपाग्नि उष्णता प्राप्यते।
    • अग्नेः समीपम् उष्णता प्राप्यते।
    • अग्नि के पास गर्मी मिलती है।
  • उपनदि देवालयः अस्ति।
    • नद्याः समीपं देवालयः अस्ति।
    • नदी के पास देवालय है।
  • उपमातृ प्रेम अस्ति।
    • मातुः समीपं प्रेम अस्ति।
    • माँ के पास प्रेम है।

उप इस अव्ययीभाव समास को वीडिओ से समझे –

३. सह

– तृतीया विभक्ति।

यदि समस्त शब्द के पूर्व में यह अव्यय हो, तो विग्रह में उत्तर पद को तृतीया लगा कर उसके बाद सह या सहितम् लिखा जाता है। इस समास में यह अव्यय सहित इस अर्थ में प्रयुक्त होता है।

  • सीता सरामं वनं गच्छति।
    • सीता रामेण सहितं वनं गच्छति।
    • सीता राम के साथ जंगल जाती है।
  • सैनिकाः सशस्त्रं रणभूमिं गच्छन्ति।
    • सैनिक शस्त्रेण सह रणभूमिं गच्छन्ति।
    • सैनिक शस्त्र के साथ लडाई के मैदान जाते हैं।
  • चौरः सशङ्कं धनिकस्य गृहं प्रविशति।
    • चौरः शङ्कया सहितं धनिकस्य गृहं प्रविशति।
    • चौर शंका के साथ धनवान के घर में घुसता है।

सह – अव्ययीभाव को इस वीडिओ से समझिए

४. निर्

षष्ठी विभक्ति।

यदि किसी वस्तु का अभाव हो (अस्तित्व ना हो)। तो यह समास होता है।

यदि पूर्व में निर् हो तो उत्तर पद को षष्ठी विभक्ति लगा कर बाद में अभावः ऐसा शब्द लिखा जाता है।

  • निर्मनुष्यम् – मनुष्याणाम् अभावः। इन्सानों की कमी।
  • निर्धनम् – धनस्य अभावः। धन का ना होना।
  • निर्विघ्नम् – विघ्नानाम् अभावः। विघ्न यानी मुसीबत। मुसीबतों का ना होना।
    • निर्विघ्नं कुरु मे देव। यह श्लोक का वाक्य आप ने सुना ही होगा।

यदि उत्तर पद के आरम्भ में क्, ख्, प् अथवा फ् इनमें से कोई एक व्यञ्जन हो तो निर् के स्थान पर निष् हो जाता है।

  • निष्कण्टकम् – कण्टकानाम् अभवः। कण्टक यानी कांटा।
  • निष्प्राणम् – प्राणानाम् अभवः। प्राणों का ना होना यानी मर जाना।
    • हमेशा स्मरण रहें कि प्राण शब्द का प्रयोग बहुवचन में किया जाता है। क्याोंकि भारतीय धर्मपरम्परा में मनुष्य के शरीर के पांच प्राण माने गए हैं।
  • निष्फलम् – फलस्य अभावः। फल का अभाव।

यदि उत्तर पद के आरम्भ में श्, ष् अथवा स् इन में से कोई भी व्यञ्जन हो, तो निर् के स्थान पर भी क्रमशः निश्, निष् और निस् अथवा निः हो जाते हैं।

अर्थात्

निर् + श् —- निर् => निश् / निः।

निर् + ष् —- निर् => निष् / निः।

निर् + स् —- निर् => निस् / निः।

  • शङ्कायाः अभावः — निर् + शङ्कम् => निश्शङ्कम् / निःशङ्कम्।
  • षटकस्य अभावः — निर् + षटकम् => निष्षटकम् / निःषटकम्।
  • सारस्य अभावः — निस् – सारम् => निस्सारम् / निःसारम्।

५. प्रति

द्वितीया अथवा सप्तमी विभक्ति।

प्रति इस अव्यय का प्रयोग वीप्सा के लिए होता है। वीप्सा – शब्ददुरुक्तिः। शब्ददुरक्तिः – शब्द को दो बार कहना।

अर्थात् उत्तर पद को द्वितीया अथवा सप्तमी इन विभक्तियों में से उचित विभक्ति लगा कर उसे दो बार लिखना।

  • भिक्षुकः प्रतिगृहम् अटति।
    • भिक्षुकः गृहे गृहे / गृहं गृहम् अटति।
    • भिखारी घर घर घूमता है।
  • अहं प्रतिदिनं मन्दिरं गच्छामि।
    • अहं दिने दिने / दिनं दिनं मन्दिरं गच्छामि।
    • मैं हर दिन मन्दिर जाता हूँ।
  • शिक्षकः प्रतिछात्रं पाठयति।
    • शिक्षकः छात्रं छात्रं पाठयति।
    • शिक्षकः हर एक छात्र को पढाता है।
  • प्रतिवर्षं वर्षा भवति।
    • वर्षे वर्षे वर्षा भवति।
    • साल दर साल बारिष होती है।

६. यथा

द्वितीया विभक्ति।

यदि पूर्व में यथा इस अव्यय का प्रयोग हो, तो उत्तरपद को द्वितीया विभक्ति लगा कर बाद में अनतिक्रम्य यह शब्द लिखा जाता है। अनतिक्रम्य इस शब्द का अर्थ है ..… के दायरे में रह कर अथवा ….. सीमा में रह कर। इस शब्द का विच्छेद इस प्रकार है –

+अति + क्रम् +ल्यप्

अन् + अति + क्रम् +

अनतिक्रम्य

  • छात्राः यथासमयं विद्यालयं गच्छन्ति।
    • छात्राः समयम् अनतिक्रम्य विद्यालयं गच्छन्ति।
    • छात्र समय के दायरे में रह कर विद्यालय जाते हैं।
    • छात्र समय रहते विद्यालय जाते हैं।
  • कक्षायां छात्राः यथास्थानम् उपविशन्ति।
    • कक्षायां छात्राः स्थानम् अनतिक्रम्य उपविशन्ति।
    • कक्षा में छात्र अपनी जगह में रह कर बैठते हैं।
  • यथाशक्ति दानं करणीयम्।
    • शक्तिम् अनतिक्रम्य दानं करणीयम्।
    • शक्ति की सीमा में दान करना चाहिए।
    • अपनी हैसियत से दान करना चाहिए।

5 thoughts on “अव्ययीभाव समास (संस्कृत)”

    • हर्ष जी,
      हमें आप का आशय समझ में नहीं आया।
      कृपया बताईए कि आप को निश्चित रूप में क्या चाहिए।

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